✍️ ध्रुव वाणी न्यूज बड़वानी
देश की राजधानी दिल्ली का लाल किला मैदान 24 मई को भारतीय जनजातीय इतिहास के एक अभूतपूर्व अध्याय का साक्षी बनने जा रहा है। पहली बार भारत के कोने-कोने से 500 से अधिक जनजातियों के लगभग दो लाख से अधिक जनजातीय समाजजन एक मंच पर एकत्रित होकर अपनी सांस्कृतिक, आध्यात्मिक और दैवीय परंपराओं के संरक्षण का संकल्प लेंगे। यह केवल एक आयोजन नहीं, बल्कि भारत की प्राचीन जनजातीय चेतना, अस्मिता और सांस्कृतिक स्वाभिमान का विराट उद्घोष होगा।

इस भव्य जनजाति सांस्कृतिक समागम का आयोजन अखिल भारतीय वनवासी कल्याण आश्रम के नेतृत्व में जनजातीय सुरक्षा मंच के बैनर तले तू मैं एक रक्त के उदघोष के साथ किया जा रहा है। यह आयोजन उस समय हो रहा है जब वैश्वीकरण, बाजारवाद और सांस्कृतिक विघटन के दौर में जनजातीय समाज अपनी मूल पहचान, परंपराओं और जीवन मूल्यों को सुरक्षित रखने के लिए संघर्षरत है।

जनजातीय प्रकोष्ठ लोक भवन भोपाल की विषय विशेषज्ञ डॉ. दीपमाला रावत ने बताया कि भारत का जनजातीय समाज केवल एक सामाजिक वर्ग नहीं, बल्कि इस राष्ट्र की प्राचीनतम सांस्कृतिक धरोहर का जीवंत प्रतिनिधि है। जल, जंगल और जमीन के साथ सहअस्तित्व का जो दर्शन आज पूरी दुनिया पर्यावरण संरक्षण के नाम पर खोज रही है। वह जनजातीय जीवन पद्धति में सदियों से विद्यमान है। प्रकृति पूजा, सामूहिक जीवन, मातृशक्ति का सम्मान, लोकदेवताओं में आस्था और धरती के प्रति संवेदनशीलता जनजातीय संस्कृति की मूल आत्मा है।

दिल्ली का यह समागम इस बात का प्रतीक बनेगा कि जनजातीय समाज अपनी परंपराओं को केवल स्मृतियों में नहीं, बल्कि जीवन व्यवहार में जीवित रखना चाहता है। यह आयोजन सांस्कृतिक प्रदर्शन भर नहीं होगा, बल्कि जनजातीय समाज की आध्यात्मिक चेतना, सांस्कृतिक अधिकार और सामाजिक अस्तित्व की राष्ट्रीय अभिव्यक्ति बनेगा। कार्यक्रम में देश के विभिन्न राज्यों से आने वाली जनजातियां अपने पारंपरिक नृत्य, लोकगीत, वेशभूषा, वाद्ययंत्र, देवी देवताओं की आराधना पद्धति तथा सांस्कृतिक विरासत का प्रदर्शन करेंगी। यह विविधता भारत की उस सांस्कृतिक एकात्मता को प्रदर्शित करेगी। जिसमें भिन्नता के भीतर भी एक साझा राष्ट्रीय आत्मा विद्यमान है।
डॉ. रावत ने बताया कि यह आयोजन आने वाले समय में जनजातीय सांस्कृतिक पुनर्जागरण का आधार बन सकता है। यदि देश अपनी जड़ों, प्रकृति और लोकजीवन से जुड़ी सभ्यताओं को सुरक्षित रखना चाहता है, तो जनजातीय समाज की परंपराओं और जीवन दृष्टि को सम्मान देना अनिवार्य होगा।
