सिर्वी समाज की बालिकाओं और महिलाओं ने जीवंत की लोक परंपरा, हर शाम बन रहा उत्सव का माहौल
दैनिक ध्रुव वाणी बड़वानी
आधुनिकता की दौड़ के बीच जब लोक परंपराएं धीरे-धीरे स्मृतियों का हिस्सा बनती जा रही हैं, ऐसे समय में ग्राम सेगांव में सिर्वी समाज की बालिकाओं और महिलाओं ने अपनी सांस्कृतिक जड़ों को सहेजने की अनूठी पहल की है। गांव में इन दिनों संजा माता की आराधना श्रद्धा, उल्लास और पारंपरिक रंगों के साथ की जा रही है। शाम होते ही घरों की दीवारों पर सजी संजा माता की आकर्षक आकृतियां और गूंजते पारंपरिक गीत पूरे गांव के वातावरण को उत्सवमय बना देते हैं।
गोबर-मिट्टी से बनती हैं आकर्षक आकृतियां
सिर्वी समाज की बालिकाएं और महिलाएं प्रतिदिन एक स्थान पर एकत्रित होकर दीवार पर गोबर, मिट्टी और प्राकृतिक सामग्री से संजा माता की अलग-अलग आकृतियां एवं कलाकृतियां तैयार करती हैं। इसके बाद फूलों और अन्य प्राकृतिक सामग्री से आकर्षक सजावट की जाती है। संजा माता के समक्ष दीप प्रज्वलित कर पूजा-अर्चना के बाद सामूहिक रूप से पारंपरिक संजा गीतों का गायन किया जाता है।
हर दिन नया रूप, हर शाम नई रौनक
संजा माता को प्रतिदिन अलग-अलग रूप और कलात्मक अंदाज में सजाया जा रहा है। बालिकाओं की कल्पनाशीलता से दीवारों पर उभरती आकृतियां देखने वालों का ध्यान आकर्षित कर रही हैं। पूजा के बाद गीत-संगीत के साथ पारंपरिक खेल और मनोरंजक गतिविधियां भी होती हैं। बालिकाएं समूह बनाकर गीत गाती हैं और उत्साहपूर्वक खेलों में भाग लेती हैं। शाम के समय जब संजा माता के पारंपरिक गीतों की स्वर लहरियां गांव की गलियों में गूंजती हैं तो माहौल भक्तिमय होने के साथ ही उल्लास से भर जाता है। आसपास की महिलाएं और परिवार भी आयोजन में शामिल होकर बालिकाओं का उत्साह बढ़ाते हैं।
बुजुर्गों से सीख रही नई पीढ़ी
इस आयोजन की खास बात यह है कि इसमें नई पीढ़ी को अपनी लोक संस्कृति से सीधे जुड़ने का अवसर मिल रहा है। बुजुर्ग महिलाएं बालिकाओं को संजा बनाने की पारंपरिक विधि, गीतों और पूजा की परंपराओं की जानकारी दे रही हैं। इस तरह एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी तक लोक संस्कृति और संस्कारों का हस्तांतरण भी हो रहा है।

केवल पूजा नहीं, संस्कृति को बचाने का माध्यम
संजा माता का आयोजन केवल धार्मिक आस्था तक सीमित नहीं है। यह लोक कला, लोकगीत, सामाजिक मेल-जोल और पारिवारिक संस्कारों को जोड़ने वाला उत्सव बन गया है। बालिकाओं की सक्रिय भागीदारी से उनमें अपनी संस्कृति और परंपराओं के प्रति लगाव बढ़ रहा है। सिर्वी समाज की महिलाओं का मानना है कि आधुनिक दौर में पारंपरिक रीति-रिवाजों को जीवित रखने के लिए नई पीढ़ी की भागीदारी जरूरी है। संजा माता का आयोजन इसी दिशा में एक सार्थक प्रयास है, जिसमें मनोरंजन के साथ संस्कार और संस्कृति भी जुड़ी हुई है।
एक साथ जुड़ रहे परिवार और समाज
प्रतिदिन होने वाले सामूहिक आयोजन से बालिकाओं, महिलाओं और परिवारों के बीच आपसी मेल-जोल बढ़ रहा है। संजा माता की आराधना सामाजिक एकता, भाईचारे और सामूहिक सहभागिता का माध्यम भी बन रही है।
ग्राम सेगांव में इन दिनों संजा माता की दीवारों पर बनी आकृतियां केवल कलाकृतियां नहीं, बल्कि पीढ़ियों से चली आ रही संस्कृति की जीवंत तस्वीर हैं। पारंपरिक गीतों की गूंज, बालिकाओं का उत्साह और महिलाओं की सहभागिता इस बात का संदेश दे रही है कि लोक परंपराएं तभी जीवित रहेंगी, जब नई पीढ़ी उन्हें अपनाकर आगे बढ़ाएगी।
