सुशांत की मौत का जिम्मेदार कौन? आखिर 21 दिनों बाद भी क्यों नहीं मिले इन सवालो के जवाब

 

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नई दिल्ली: जो दिल बेचारा जिंदगी से इतना प्यार करता था. जो धड़कता था सिर्फ उन आवाजों के साथ जो कहती थीं. मैं भी सुशांत, मैं भी सुशांत. उन आवाजों को चीखों में, गुस्से में और गुबार में बदलकर सुशांत ने जाते-जाते एक मुहिम को जिंदा कर दिया है.

खुद जलाकर बदलाव की ज्वाला. ओझल हो गया सितारा गंगा किनारे वाला. सपनों के मर जाने से खतरनाक कुछ नहीं होता. लेकिन जिस सुशांत की आंखों में सपने, उम्मीदों के बीज बनकर बेपरवाह बरगद की तरह उग आए थे उसकी जडों को कौन काट रहा था.

कौन था जो परिवारवाद का तेजाब डालकर सुशांत को अशांत कर रहा था. परिश्रम के जिस ‘पानी’ पर सुशांत की हसरतें किसी मछली की तरह मचल रही थीं. उस पानी में परिवारवाद का जहर कौन घोल रहा था? कौन था जिसकी आंखों के लिए सुशांत कांटा बन गए थे?

कौन था जो सुशांत को सितारा नहीं धूल बनाना चाहता था? अब आप इसे विचित्र संयोग कहें, या कुछ और लेकिन अंतरिक्ष की दुनिया में खोए रहने वाले सुशांत के साथ जो हुआ वैसा ही कुछ अंतरिक्ष की दुनिया में सच में हो गया है.

कुंभ नक्षत्र यानी Constellation of Aquarius में वैज्ञानिकों ने कुछ वर्ष पहले एक बहुत बडे़ सितारे को ढूंढा था. ये सितारा बहुत चमकीला था और सूर्य से करीब 20 लाख गुना बड़ा भी था. लेकिन किनमैन ड्वार्फ गैलेक्सी का ये सबसे चमकदार सितारा अचानक आंखों से ओझल हो गया.

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वैज्ञानिक समझ नहीं पा रहे कि आखिर हुआ क्या, कैसे हुआ और क्यों हुआ? लेकिन इत्तेफाक की बात ये है कि रात के अंधेरे में अपने टेलिस्कोप से तारे ढूंढने वाले सुशांत सिंह भी कुंभ राषि के थे और कुंभ नक्षत्र से गायब हुए इस महा सितारे की तरह वो भी अचानक बिना किसी को कुछ बताए चले गए.

लेकिन एक स्टार को स्टार डस्ट बनाने वालों को इंसाफ की दूरबीन कब ढूंढ निकालेगी. इसका इंतजार सबको है. सुशांत सिंह राजपूत की हत्या के मामले में पुलिस करीब 28 लोगों के बयान दर्ज कर चुकी है. कुछ अपने, कुछ पराए लेकिन सबकी अलग- अलग राय है.

सुशांत सिंह राजपूत के जीजा विशाल कीर्ति ने एक नेपोमीटर लॉन्च करने  की घोषणा की है. ये नेपोमीटर बता पाएगा कि किसी फिल्म में परिवारवाद कितना हावी है और उस फिल्म में बाहर से आए कलाकारों को कितनी जगह दी गई है.

बॉलीवुड में कला के जौहरियों का ये दावा है कि उनका एकमात्र पैमाना सिर्फ कलाकारों का टैलेंट है. लेकिन नेपोमीटर इन दावों की सच्चाई सामने ला देगा. आध्यातिमक गुरू ओशो के मुताबिक आत्महत्या वो नहीं करता जो जीवन से हार चुका है,

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बल्कि आत्महत्या वो करता है जो सोचता है कि जीवन इससे बेहतर भी हो सकता है. यानी जीवन को मर्जी के मुताबिक हासिल ना कर पाने की ललक ही किसी को आत्महत्या के करीब ले जाती है. लेकिन सुशांत जैसा एक तारा इतना भी बेचारा कैसे हो सकता है,

कि वो डूबने से पहले इशारा भी ना दे. इसलिए पुलिस इस बात की भी जांच कर रही है कि बॉलीवुड के लाइट, कैमरा, एक्शन और पैकअप के बाद की कहानी के आगे कहीं परिवारवाद के अंधेरे में तो नहीं डूबी. और कहीं अपने परिवार के लिए सफलता की सड़क बनाने वालों ने ही सुशांत को रास्ते का पत्थर तो नहीं मान लिया.