Omkareshwar Jyotirlinga: ओंकोरश्वर में दो रूपों में विराजमान हैं भगवान शिव

Omkareshwar Jyotirlinga

Omkareshwar Jyotirlinga: देश के बारह ज्योतिर्लिंग में शामिल खंडवा जिले के ओंकारेश्वर के दरबार में महाशिवरात्रि पर देशभर से श्रद्धालु दर्शनों के लिए उमड़ेगे। दर्शन के लिए शिवरात्रि पर 24 घंटे मंदिर के पट खुले रहेंगे। मोक्षदायनि मां नर्मदा के किनारे स्थित ओंकारेश्वर में भगवान भोलेनाथ दो रूपों में विराजित हैं।

मान्यता है कि इनमें एक ओंकारेश्वर और दूसरा रूप ममलेश्वर है। मां नर्मदा के तट पर बसा भगवान भोलेनाथ के इन ज्योतिर्लिंगों के दर्शन मात्र से ही भक्तों का कल्याण हो जाता है। इसी प्रकार ओंकारेश्वर मंदिर को लेकर मान्यता है कि रात्रि में भोलेनाथ और माता पार्वती यहां रात्रि विश्राम करते हैं।

इसलिए उनके लिए पालना, सेज और चौसर-पांसे यहां सजाएं जाते हैं। बारह ज्योतिर्लिंगों में मध्य प्रदेश के दो ज्योतिर्लिंगों में शामिल ओंकारेश्वर ज्योतिर्लिंग पवित्र नर्मदा नदी के तट पर स्थित है। इस स्थान पर नर्मदा के दो धाराओं में विभक्त हो जाने से बीच में ओम आकार का टापू बन गया है।

इसे ओंकार पर्वत या शिवपुरी कहा जाता हैं। इसी पर्वत पर ओंकारेश्वर ज्योतिर्लिंग का मंदिर स्थित है। वहीं मां नर्मदा के दक्षिण तट पर ममलेश्वर ज्योतिर्लिंग के रूप में भगवान शिव विराजमान है। दोनों ही मंदिर यहां आस्था का केंद्र है। ओंकारेश्वर ज्योतिर्लिंग के दो स्वरूप होने की कथा पुराणों में दर्ज है।

Omkareshwar Jyotirlinga में बताया जाता है कि विंध्यपर्वत ने छह मास तक भगवान शिव की कठिन उपासना की थी, जिससे प्रसन्न होकर भगवान ने विंध्य को मनोवांछित वर दिया। इस अवसर पर वहां अन्य ऋषि और मुनि भी मौजूद थे। वे भी अपनी मनोकामना पूरी करने की प्रार्थना कर रहे थे,

इस पर भगवान शिव ने ओंकारेश्वर के दो भाग किए। एक का नाम ओंकारेश्वर और दूसरे का ममलेश्वर पड़ा। दोनों लिंगों का स्थान और मंदिर पृथक होते भी दोनों का महत्व, सत्ता और स्वरूप एक ही माना गया है, शिवपुराण में ज्योतिर्लिंग की महिमा का विस्तार से वर्णन भी है।

ओंकारेश्वर में शिवरात्रि के अलावा सावन माह तथा नर्मदा जयंती भी धूमधाम से मनती है। सावन में यहां से नर्मदा का जल भरकर हजारों कावड़िए पैदल यात्रा कर उज्जैन में भगवान महाकालेश्वर का जलाभिषेक करते हैं। वहीं चारधाम की यात्रा और मां नर्मदा की परिक्रमा करने वाले परिक्रमावासियों का संकल्प भगवान ओंकारेश्वर के दर्शन और पूजन के बगैर पूर्ण नहीं होता है।

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